हार को साथ हर दम सभाले हुये
पास रहता नहीं यू कोई जीत कर
उन अभागे छड़ो की संमीक्षा न हो
आँख जब एक उदासी का घर हो गई
चुप रहे हम सदा कुछ न बोले कभी
चुपिया फिर गुनाहों का स्वर हो गई
न्याय का कब कोई है एक आधार है
याचना हर घडी यातना जन्म भर
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