Sunday, 15 May 2016

सांस के युद्ध  में  मन पराजित  हुआ
याद की  अब कोई राजधानी नहीं
प्रेम तो जन्म से प्रड़यहीन  है
बात  लेकिन  कभी हमने मानी  नहीं
हर नए युग  तुम्हारी प्रतीक्षा  रही
हर  घडी शुम समय से अधिक  देख कर
 


भावुकता का सूरज निशदिन चढ़ता और उतरता है
याद का  चंदा  नियमित आकर ठंडी आहे भरता है
जीवन तुम तक सीमित  होकर पूरी दुनिया जैसी  है
तुमसे बाहर आकर अपनी  छाया  से  भी  डरता  है
प्यार  दुनिया मै  ही  हमने  अपनी  दुनिया बोई  है
एक तुम्हारे  पीछे  हमने अपनी  सुधबुध  खोई  है 

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